खेत बेचकर जमा करते हैं कोचिंग की फ़ीस लेकिन नहीं है रोज़गार…

March 18, 2018 by No Comments

लखनऊ. ‘नौजवान भारत सभा’ की लखनऊ इकाई की ओर से शनिवार को निराला नगर स्थित अनुराग पुस्‍तकालय में ‘शिक्षा का बाज़ारीकरण और रोज़गार का बढ़ता संकट’ विषय पर एक विचार-चर्चा का आयोजन किया गया जिसमें वक्‍ताओं ने अच्‍छी गुणवत्‍ता वाली शिक्षा का आम लोगों की पहुँच से दूर होते जाने और रोज़गार की सम्‍भावनाओं के लगातार कम होते जाने के पीछे के कारणों पर विस्‍तार से बातचीत की। कार्यक्रम की शुरुआत हमारे समय के महानतम वैज्ञानिक और लेखक स्‍टीफ़न हॉकिंग को श्रद्धांजलि देने के साथ हुई जिनका गत 14 मार्च को 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया था। चर्चा की शुरुआत में ‘नौजवान भारत सभा’ की ओर से बात रखते हुए आनन्‍द सिंह ने कहा कि आज़ादी के बाद से ही तमाम सरकारों ने शिक्षा की अनदेखी की और उनका पूरा ध्‍यान महज़ कुछ कुलीन संस्‍थानों पर केन्द्रित रहा।

1980 के दशक में आई नई शिक्षा नीति और 1990 के दशक में जोर-शोर से शुरू की गई नवउदारवादी नीतियों ने गुणवत्‍ता वाली शिक्षा को आम लोगों की पहुँच से दूर कर दिया। नवउदारवाद के मौजूदा दौर में साबुन, तेल, मसाला, मंजन की ही तरह शिक्षा भी एक बाज़ारू माल बनकर रह गई है। जो युवा किसी तरह विश्‍वविद्यालयों तक पहुँचते भी हैं उनमें से अधिकांश के सामने भविष्‍य में एक अदद रोज़गार की तलाश में दर-दर ठोकरें खाने के अलावा और कोई रास्‍ता नहीं बचता। इस अंधेरगर्दी का ही यह नतीजा यह है कि इस देश में आज बेरोज़गारों, अर्द्धबेरोज़गारों और प्रच्‍छन्‍न बेरोज़गारों की कुल संख्‍या 25 करोड़ को भी पार कर चुकी है। बेरोज़गारों के इस हुजूम में हर साल सवा करोड़ लोग शामिल हो जाते हैं। ये बातें इन नीतियों के लागू होने के बाद से सरकारी नौकरियों में हुई जबर्दस्‍त कटौती व निजी क्षेत्र में पर्याप्‍त रोज़गार न पैदा होने की वजह से बेरोज़गारी का संकट गहरा गया। उन्‍होंने बताया कि बेरोज़गारी पूँजीवादी व्‍यवस्‍था की ज़रूरत है क्‍योंकि बेरोज़गारों की ‘औद्योगिक रिजर्व सेना’ की मौजूदगी से रोज़गार प्राप्‍त लोगों पर कम वेतन पर ज्‍़यादा काम करने का दबाव बनाया जाता है। पूँजीवादी विकास के साथ ही साथ उजड़ते किसानों, महिलाओं और बच्‍चों एवं उजड़ते छोटे मालिकों के लगातार बेरोज़गारों की ‘औद्योगिक रिजर्व सेना’ में शामिल होने की वजह से उन्‍होंने यह भी कहा कि बेरोज़गारी की समस्‍या को पूरी तरह से हल करने के लिए पूँजीवादी व्‍यवस्‍था को बदलकर एक ऐसी व्‍यवस्‍था का निर्माण करने की ज़रूरत है जिसका मक़सद मुनाफ़ा न होकर लोगों की ज़रूरतें पूरी करना हो।

साथ ही उन्‍होंने जोड़ा कि मौजूदा व्‍यवस्‍था के भीतर सबके लिए एकसमान व नि:शुल्‍क शिक्षा व रोज़गार की गारण्‍टी के अधिकार के लिए संघर्ष तेज़ करना आज के वक्‍़त की ज़रूरत है। मसूद रिज़वी ने अपने अनुभव को साझा करते हुए बताया कि पहले कोई शिक्षकों द्वारा ट्यूशन या कोचिंग पढ़ाना बहुत अच्‍छा काम नहीं माना जाता था, लेकिन पिछले कुछ दशकों में कोचिंग और ट्यूशन की नई संस्‍कृति पैदा हुई है जिसकी वजह से आम छात्रों की समस्‍याएँ बढ़ती जा रही हैं। उन्‍होंने मन्‍दी के दौर से गुज़र रही पूँजीवादी व्‍यवस्‍था में नए वित्‍तीय उपकरणों के ज़रिये मुनाफ़ा कमाने के नए अवसरों पर बात रखते हुए कि कहा कि वित्‍तीय जगत में हुए निवेश रोज़गार के विशेष अवसर नहीं पैदा होते।

अखिल कुमार ने तकनीकी शिक्षा और प्रोफ़ेशनल कोर्स के नाम पर जारी अंधेरगर्दी पर बात रखते हुए कहा कि तकनीकी शिक्षा संस्‍थान तो कुकुरमुत्‍ते की तरह पनप रहे हैं लेकिन इन संस्‍थानों से जो डिग्री मिलती है वो ज्‍़यादातर छात्रों के लिए किसी काम की नहीं होती क्‍योंकि रोज़गार के इतने अवसर ही नहीं उपलब्‍ध है। आईटी सेक्‍टर का सितारा भी पिछले कुछ समय से गर्दिश में चल रहा है। आने वाले दिनों में आर्टिफ़ीशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन की वजह से इस क्षेत्र में नई नौकरियों की सम्‍भावना तो कम होगी ही, साथ ही साथ जिन लोगों को रोज़गार मिला भी हुआ है उनपर भी छँटनी की तलवार लटक रही है। लालचन्‍द्र ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के नाम पर कोचिंग संस्‍थानों की मुनाफ़ाखोरी पर आक्रोश व्‍यक्‍त करते हुए कि अर्थव्‍यवस्‍था में भले ही मन्‍दी छायी हो, लेकिन भाँति-भाँति की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए चल रही कोचिंग संस्‍थाओं का धन्‍धा खूब चल रहा है। तमाम छात्रो कर्ज लेकर या खेत बेचकर इस आस में महँगी कोचिंग करते हैं कि नौकरी मिलने पर उनके खुशहाल दिन आएंगे, परन्‍तु नंगी सच्‍चाई तो यह है कि अधिकांश छात्रों को अच्‍छी नौकरी नहीं मिलने वाली। इसलिए अकेले-अकेले केवल अपने कॅरियर के बारे में सोचने की बजाय मिलजुलकर अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए एक संगठित प्रयास करना होगा। बातचीत में रफ़त फ़ातिमा, हिमांशु, रूपा,शिप्रा, संजय, अनुभव, अनुपम आदि ने भी भागीदारी की।

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