तुर्की का म्यांमार से कोई फ़ायदा नहीं लेकिन सबसे पहले और आगे बढ़कर कर रहा है रोहिंग्या लोगों की मदद

अंकारा: तुर्की के राष्ट्रपति रजब तय्यिप एरदोगन विश्व के ऐसे नेता हैं जिनका सम्मान पूरे विश्व में है. कुछ ऐसी सरकारें ज़रूर हैं जो उन्हें पसंद नहीं करतीं लेकिन उनके बारे में ये बात कही जाती है कि वो अपनी समझ के हिसाब से ही काम करते हैं.

सीरिया में जब गृह युद्ध शुरू हुआ तो तुर्की ने आम लोगों के लिए सीमाएं खोल दीं.सीरिया से ३० लाख लोग भाग कर बग़ल के देश तुर्की में आ पहुंचे. 2011 के बाद से लगातार चले इस गृह युद्ध से भाग कर आये रिफ्यूजी लोगों पर तुर्की अब तक ३० बिलियन डॉलर से भी अधिक ख़र्च कर चुका है. और जानकारों के मुताबिक़ इसको लेकर उन्हें कोई ठीक वैश्विक मदद भी नहीं मिल रही है.

एरदोगन ने तुर्की को एक बार फिर वैश्विक नक़्शे पर आगे किया है. मज़लूम लोगों के हक़ में खड़े होने की पहचान से तुर्की को विशेष फ़ायदा हुआ है.

म्यांमार के रखीने प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों के नरसंहार के ख़िलाफ़ तुर्की ने आवाज़ भी उठायी और बंगलादेश भाग कर गए रोहिंग्या रिफ्यूजी की मदद भी की है. 10 हज़ार टन सामान पहुंचाने की बात तो एरदोगन कह ही चुके हैं, अपने परिवार और मंत्रियों को वहाँ जायज़ा लेने भी भेजा है.

जहां पहले कुछ लोग ये कह रहे थे कि तुर्की सीरिया के रिफ्यूजी की मदद इसलिए कर रहा है क्यूंकि ये उसके बग़ल में है और कोई ना कोई हित तुर्की का ज़रूर है. अब म्यांमार में जिस प्रकार की मदद तुर्की दे रहा है उसके बाद साफ़ है कि ये मदद बिना किसी हित की ही है. म्यांमार की तुर्की से दूर दूर तक कोई सीमा नहीं है और ना ही म्यांमार से तुर्की की सभ्यता का कोई मेल है. इसके बावजूद भी तुर्की के राष्ट्रपति का रोहिंग्या की मदद का फ़ैसला क़ाबिले तारीफ़ है.रोहिंग्या मुसलमानों के लिए अब दूसरे देश और एजेंसियां भी सक्रिय नज़र आ रही हैं. इस पूरे मामले में म्यांमार की नेता औंग सन सू की को ज़बरदस्त आलोचना का सामना करना पड़ा है.

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