फ़िल्मों के लिए अब कहाँ पहले जैसा क्रेज़…

ना तो मुझे तारीख़ याद है और ना ही ये भी सही से याद है कि वो साल 1994 था या 1995 लेकिन हाँ इतना याद है कि मैं अम्मी के साथ कैलाश टॉकीज़ के गेट पर खड़ा हुआ था. सलमान ख़ान और माधुरी दीक्षित की फ़िल्म हम आपके हैं कौन..! लगी थी और ऐसा लग रहा था मानो पूरे बदायूँ शहर को यही फ़िल्म देखनी थी. टिकट खिड़की पर ज़बरदस्त भीड़ थी, कहीं कोई जगह नज़र नहीं आ रही थी..फिर अचानक ही एक आदमी सारे लोगों पर चढ़ गया और रेंगता हुआ खिड़की तक पहुँचने की कोशिश करने लगा. इस क़दर भीड़ थी कि टुकड़ों में टिकट मिला, तीन टिकट फर्स्ट और तीन टिकट बालकनी. खैर वो भी ले लिए…जहां तक मुझे याद है ये सिनेमा हॉल में मेरी पहली ऐसी फ़िल्म थी जिसका कोई क़िस्सा मुझे याद है. इस फ़िल्म के साथ एक बात ये भी है कि ये फ़िल्म मेरी अम्मी की आख़िरी ऐसी फ़िल्म थी जो उन्होंने सिनेमा हॉल में देखी. फर्स्ट की फ्रंट सीट पर बैठ कर फ़िल्म देखने के बाद ही अम्मी ने ये फ़ैसला लिया कि आइन्दा सिनेमा हॉल में फ़िल्म ही नहीं देखेंगी. बहरहाल…

ये वो दौर था जब लोग फ़िल्मों के पोस्टर देखने के लिए उन ख़ास जगहों पर जाते थे जहां पोस्टर लगते थे.हर जुमेरात की शाम वहाँ पहुँचते और कल लगने वाली फ़िल्म के पोस्टर को जी भर के देखते और अगर फ़िल्म मनपसंद होती तो सिनेमा हॉल में जाकर उसके बड़े साइज़ के पोस्टर देखते.इतना ही नहीं सिनेमाहॉल के अन्दर कुछ छोटे-छोटे पोस्टर्स लगते थे जो शीशे के अन्दर लगे होते थे, और उनकी और सेफ्टी के लिए जाली भी होती थी. वो भी देखने का अपना मज़ा था. तब छोटे शहरों में फ़िल्में बड़े शहरों के काफ़ी दिन बाद लगती थीं. नयी फ़िल्मों को देखने के लिए वीडियो कैसेट चलते थे. अक्सर मोहल्ले के घुमक्कड़ बच्चे दोपहर को वीडियो कैसेट वाले की दुकान पर जाकर झाँक झाँक कर फ़िल्में देखा करते थे. कभी ऐसा भी होता कि वो नाराज़ होकर भगा देता. परिवार की बात की जाए तो किसी एक के यहाँ वीसीआर किराए पर लिया जाता तो उसके बारे में पहले से ही हल्ला हो जाता. वीसीआर लाने वाला भी पहले से अपने ख़ास दोस्तों को सूचना दे देता और साथ ही ये भी कह देता कि किसी और को ये राज़ ना बताया जाए.अब तो खैर ना वो सिनेमा हॉल रहे और ना ही अब वो भाईचारा.

तब फ़िल्में देखना कोई फ़ज़ूल का काम नहीं माना जाता था. तब परिवार के लोग साथ में फ़िल्म देखने जाते थे और हर फ़िल्म के बाद उसकी लम्बी चौड़ी समीक्षा घर में होती थी. हालाँकि अब ज़माना यूँ है कि हर किसी के पास ऐसा मोबाइल आ गया है कि उसमें फ़िल्में देखी जा सकती हैं लेकिन अब लोग उस तरह से फ़िल्म नहीं देखते.पहले कॉमेडी फ़िल्मों में भी कहानी होना ज़रूरी था और अब कॉमेडी है या कॉमेडी के नाम पर कुछ भी है तो वो फिर ठीक ही है. ये सही है कि तब भी ख़राब फ़िल्में बनती थीं और कई बार ऐसी फ़िल्में हिट भी हो जाती थीं लेकिन उनको लेकर लोगों का उत्साह कम ही होता था. मुझे तो ये भी लगता है कि लोगों की फ़िल्मों को लेकर समझ में भारी गिरावट भी आयी है.कभी कभी तो ये भी लगता है कि फ़िल्में बाज़ारवाद की भेंट चढ़ गयी हैं जहाँ सामान अच्छा बनाना नहीं दिखाना होता है.

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अरग़वान रब्बही

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