क्या समाज में जानबूझकर फैलायी जा रही है हिन्दू और मुसलमान में नफ़रत? कौन है इसका ज़िम्मेदार?

March 13, 2018 by No Comments

एक समय था जब लोग हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात ज़ोर-शोर से किया करते थे। अब तो ऐसा समय आया है जिसमें लोग ये कहते हैं कि “कुछ मुसलमान अच्छे भी होते हैं” या “सब हिन्दू बुरे नहीं होते”…ये इस तरह के जुमले हैं जो देश के किसी भी कोने में सुनने को मिल सकते हैं। इन बयानों में नकारात्मकता का भाव है… कुछ लोग यूँ भी हैं जो तमाम मुसलमानों की बुराई करने के बाद आख़िर में कहेंगे कि लेकिन हमें मुसलमानों से नफ़रत नहीं, हम ए पी जे अब्दुल कलाम की बहुत इज़्ज़त करते हैं।

कलाम की तारीफ़ करके अगर कोई दुनिया भर के मुसलमानों के प्रति नफ़रत भर रहा है तो इसको ध्यान से समझिए। कलाम ने बतौर वैज्ञानिक देश की बहुत सेवा की और बाद में वे राष्ट्रपति भी रहे लेकिन देश में उनके अलावा भी जो मुसलमान हैं या थे सबका बराबर सम्मान होना चाहिए। कभी यूँ भी कोई बात करते मिलता है कि कुछ मुसलमान इतने अच्छे होते हैं कि गीता पढ़ते हैं… समझने की बात ये है कि गीता पढ़ना अच्छी बात हो सकती है लेकिन गीता पढ़ने और ना पढ़ने से किसी के अच्छे या बुरे होने का लॉजिक नहीं लगाया जा सकता।

ये बातें सिर्फ़ एक धर्म तक सीमित नहीं हैं, हर धर्म के लोग अपने धर्म की गौरव गाथा बताने में दूसरे धर्म को कोसने का काम कर रहे हैं। हिन्दू की तारीफ़ करने के लिए मुसलमान की बुराई ज़रूरी नहीं और मुसलमान की तारीफ़ करने के लिए हिन्दू की बुराई करने की कोई ज़रूरत नहीं। ये बात बहुत मामूली सी है लेकिन हम अपनी सोच को अब बुनियादी मुहब्बत से हटा चुके हैं। समाज अब नफ़रत करना सीख रहा है और सिखा रहा है। जो कुछ लोग मुहब्बत का पैग़ाम लेकर निकलते भी हैं तो उन्हें वो सम्मान नहीं मिल पाता। और फिर ये जो दौर है सोशल मीडिया और वीडियो बाज़ी का… कुछ रोज़ पहले मैं यूट्यूब पर हिन्दू मुस्लिम एकता के वीडियो तलाश कर रहा था। हिन्दू मुस्लिम दुश्मनी के वीडियोज़ सामने आ गए और जो कुछ वीडियो आये भी सामने वो 2011 या आस पास के थे।

इसका मतलब क्या ये है कि हिन्दू-मुस्लिम एकता में इसी दौर में सेंध लगी। पहले से ही कई ना-नुकुर के साथ होने वाली एकता अब साफ़ नफ़रत की तरफ़ बढ़ चुकी है। कोई छुप छुपा कर दूसरे धर्म के लोगों को बुरा-भला नहीं कह रहा है…सामने आकर tv पर, वेबसाइट्स पर.. ये सब बातें की जा रही हैं। मुझे तो बस इसी बात का डर है कि कहीं किसी रोज़ ये tv के अंदर बैठे नफ़रतबाज़ बाहर ना निकल आये।

~
अरग़वान रब्बही

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *