क्या गुजरात चुनाव में कांग्रेस को मिलेगा आम आदमी पार्टी का साथ?

October 18, 2017 by No Comments

अन्ना हज़ारे ने 2011 में जब अपना आन्दोलन शुरू किया था तो वो आन्दोलन था तो जन लोकपाल बिल के समर्थन में लेकिन उसने एक ऐसा माहौल तैयार किया जो कांग्रेस पार्टी के लिए बहुत ही घातक रहा. हज़ारे के आन्दोलन में उनके साथी रहे अरविन्द केजरीवाल ने कुछ साथियों के साथ मिलकर आम आदमी पार्टी बना ली और दिल्ली में विधानसभा चुनाव लड़ा. 2012 में बनी पार्टी ने अपना पहला चुनाव 2013 में लड़ा. इस चुनाव में पार्टी को 70 में से 28 सीटें हासिल हुईं जबकि कांग्रेस 43 से महज़ 8 पर आ गयी. भाजपा ने इस चुनाव में सबसे अधिक 31 सीटें हासिल तो कीं लेकिन वो सरकार बनाने में नाकाम रही. आख़िरकार केजरीवाल को कांग्रेस से समर्थन मिला और पहली बार अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने. हालाँकि उन्होंने 49 दिन सरकार चलाने के बाद इस्तीफ़ा दे दिया और 2015 में दुबारा चुनाव हुए. इस चुनाव में केजरीवाल की पार्टी ने दूसरी सभी पार्टियों का सफ़ाया कर दिया लेकिन सबसे बड़ा नुक़सान कांग्रेस को हुआ जिसे 70 सीटों वाली विधानसभा में एक भी सीट हासिल नहीं हुई तो भाजपा को किसी छोटी पार्टी की तरह 3 सीटें मिल गयीं. ये दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों के लिए बड़ा झटका रहा.

इसके बावजूद भी आम आदमी पार्टी अभी तक दिल्ली और पंजाब में ही अपनी पहचान को मज़बूत कर पायी है. परन्तु पार्टी का जनाधार देश के दूसरे राज्यों में भी है. जानकारों के मुताबिक़ पार्टी गुजरात चुनाव को प्रभावित करने की क्षमता रखती है. यही वजह है कि कांग्रेस के वरिष्ट नेता अशोक गहलोत कहते हैं कि देशहित में आम आदमी पार्टी को गुजरात चुनाव नहीं लड़ना चाहिए. ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ कांग्रेस इस बात को कह रही है, आम आदमी पार्टी के कुछ नेता भी दबी ज़बान में ये मानते हैं कि इस वक़्त पार्टी को कांग्रेस का समर्थन करना चाहिए. कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया कैंपेन देखो तो ऐसा लगता है जैसे दोनों एक दूसरे को कई मुद्दों पर समर्थन दे रहे हैं. सोशल मीडिया की महारथी माने जाने वाली आम आदमी पार्टी ने जिस प्रकार मोदी सरकार की नीतियों का विरोध किया है उसकी वजह से भाजपा सोशल मीडिया पर पिछड़ सी गयी है. हालाँकि इसको लेकर कांग्रेस ने भी बहुत काम किया है लेकिन अरविन्द केजरीवाल की पार्टी ने भी इसमें भाजपा को विशेष नुक़सान पहुंचाया है. कुछ साल पहले कांग्रेस पर ही आघात करने वाली पार्टी अब कांग्रेस के ही क़रीब आती नज़र आ रही है.

इसके पहले भी आम आदमी पार्टी ने सेक्युलर ताक़तों के समर्थन में चुनाव नहीं लड़ा था. 2017 में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी ने चुनाव ना लड़ने की कोई वजह तो इस तरह से नहीं बतायी थी लेकिन इससे यही अनुमान लगाया गया था कि ये सपा+कांग्रेस गठबंधन के लिए फ़ायदे वाला होगा. हालाँकि चुनाव के नतीजों में भाजपा की बड़ी जीत हुई जिसको लेकर बसपा और सपा ने ये भी कहा कि चुनाव में गड़बड़ियाँ हुई हैं. कुछ इसी तरह के आरोप पंजाब चुनाव को लेकर आम आदमी पार्टी ने भी लगाए. बहरहाल कांग्रेस ये उम्मीद कर रही है कि आम आदमी पार्टी गुजरात में चुनाव ना लड़े जिससे वो वोट जो भाजपा से नाराज़ हैं,बिखरने ना पायें.

गुजरात विधानसभा चुनाव में अगर ऐसा होता है तो इस बात की भी संभावनाएं लगाई जा सकती हैं कि 2019 लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी भी विपक्ष के साथ गठबंधन में शामिल हो सकती है.

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