Women Achiever’s Series: रुख्माबाई राउत थी देश की पहली महिला जिसने कहा- मुझे बिना मर्जी के शादी से इंकार है

January 17, 2018 by No Comments

भारत के इतिहास में महिलाओं के लिए कई पाबंदियां रही हैं। उस वक़्त में महिलाओं के पैरों में समाज द्वारा पहनाई गई बेड़ियां रहती थी। जिन्हे कई सामाजिक कुरीतियां ताला लगाकर उन्हें उसमें बाँध कर रखती थी। ये प्रचलन आज भी चलता आ रहा है। भारत जैसे देश जहाँ सामाजिक ताने-बाने से ऊपर उठकर सपने देखने से भी डरती हैं, वहीं इस देश में ऐसी महिलायें भी थी, जिन्होंने सपने देखने का जज्बा रखा और समाज की इन बेड़ियों को तोड़ कर अपने सपनों की उड़ान भरी।

क्या आप जानते हैं, देश की पहली महिला डॉक्टर कौन थी ?

उनका नाम है रुख्माबाई राउत, जोकि रुख्माबाई राउत ब्रिटिश राज में भारत में प्रैक्टिस करने वाली पहली महिला डॉक्टर थीं।
रुखमाबाई का जन्म 22 नवंबर 1864 में मुबंई में हुआ था। साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया था, जिसके बाद उनकी मां ने डॉक्टर सखाराम अर्जुन से शादी कर ली थी। उस वक़्त में बाल विवाह की प्रथा देश में जोरों-शोरों चल रही थी। जिसके चलते सिर्फ 11 साल की उम्र में रुखमाबाई की शादी दादा जी भिकाजी से करवा दी गई। लेकिन रुखमाबाई शादी के बाद अपने पति के साथ नहीं गई। पति द्वारा दबाब डालने पर रुखमाबाई ने अपने पति के साथ रहने से साफ इंकार कर दिया।
अपने माता-पिता के घर में ही रहकर अपनी पढ़ाई जारी रखी। जिसमें उनके सौतेले पिता ने उन्हें समर्थन दिया। वह शायद भारत की पहली महिला थीं जिन्होंने अपनी एमडी की डिग्री पूरी की। हालांकि इसमें काफ़ी अड़चन भी आई क्योंकि उस समय लंदन स्कूल ऑफ़ मेडिसिन महिलाओं को एमडी करने की इजाज़त नहीं देता था। जिसके लिए उन्होंने संघर्ष किया और आख़िरकार ब्रसेल्स से अपनी एमडी की पढ़ाई पूरी की।

इसके अलावा रुख्माबाई की वजह से कानून में ऐतिहासिक ‘एज ऑफ कॉन्सेंट एक्ट 1891’ को शामिल किया गया।
विवाह के बावजुद अपने पति के साथ न रहना, जिसने उस ज़माने में काफ़ी हंगामा मचा दिया। लेकिन वह इस बात पर अड़ी रहीं कि उस विवाह बंधन में वो नहीं रहेंगी जिसमें उनकी मर्जी नहीं है। 1884 में उनके पति ने वैवाहिक अधिकारों का हवाला देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी, ताकि वो उसके साथ आकर रहें। इस मामले में कोर्ट ने रुखमाबाई को उनके पति या जेल में से एक को चुनने के लिए कहा। रुखमाबाई ने दो-टूक जवाब दिया कि उन्हें जेल जाना ज्यादा पसंद होगा।

इसके ख़िलाफ़ उन्होंने काफी संघर्ष किया और इस बारे में क्वीन विक्टोरिया को ख़त लिखा। कोर्ट में केस की सुनवाई के दौरान उन्होंने जिस तरह से अपना पक्ष रखा, शायद ही किसी भारतीय महिला ने इस मामले में बोलने की हिम्मत दिखाई हो। उनका तर्क था कि जिस समय उनकी शादी हुई थी, उस वक़्त वह बहुत छोटी थी और उनकी रजामंदी के बिना ही शादी करवाई गई थी। जिसमें उनकी सहमति नहीं, वह उस शादी को नहीं मानेगी। इसके साथ वह छोटी उम्र में गर्भवती होने के खिलाफ थी। आखिरकार फैसला उनके पक्ष में हुआ। उनका केस भारत में शादी की उम्र को तय करने का आधार बना।
उनका वैवाहिक विवाद, शायद भारत में तलाक़ का पहला मामला था, जहां किसी महिला कोर्ट से कहा हो कि उसे बिना मर्जी के शादी से इंकार है। इसके बाद एक सफल डॉक्टर के रूप में रुखमाबाई ने 35 साल तक अपना योगदान दिया। महिला अधिकारों को लेकर टाइम्स ऑफ़ इंडिया में ‘द हिंदू लेडी’ के नाम से लेख भी लिखती थीं। इसके जरिये उन्होंने बाल विवाह के खिलाफ लोगों में जागरुकता फैलाकर एक सक्रिय समाज सुधारक का काम किया।

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