Women Achiever’s Series: पढ़ें महिला हिंसा के खिलाफ लड़ने वाली संपत पाल ने कैसे बनाई “गुलाबी गैंग”

January 14, 2018 by No Comments

महिला हिंसा के खिलाफ आवाज़ उठाकर महिला सशक्तिकरण के रास्ते पर अकेली निकल पड़ी संपत लाल ने किसी भी खतरे से बिना डरे इस जंग को जीता। संपत लाल, जो साल 1960 में उत्तर प्रदेश के छोटे से गाँव बैसकी में एक गरीब परिवार में जन्मी और पली-बढ़ी। परिवार में गरीबी होने के कारण उन्हें पढ़ाया नहीं गया।

यह क्षेत्र देश के सबसे गरीब जिलों में से एक है और इसमें गहरी पितृसत्तात्मक संस्कृति, कठोर जाति विभाजन, महिला निरक्षरता, घरेलू हिंसा, बाल मजदूरी, बाल विवाह और दहेज प्रथा जैसी कुरीतियां भरी पड़ी थी। समाज में बाल-विवाह की प्रथा का प्रचलन उस वक़्त काफी हावी था। जिसके चलते संपत पाल की शादी उनके परिवार ने 12 साल की उम्र में एक सब्ज़ी बेचने वाले से कर दी। चार साल के अंतराल के बाद संपत अपने ससुराल चली गई।
यहाँ पर आकर उन्होंने अपने जीवन-यापन के लिए काफी संघर्ष किया। अनपढ़ होने के बावजूद संपत खुले विचारों की थी। समाज में मौजूद कुरीतियों और भेदभाव का विरोध करती थी। उनके इस व्यवहार के कारण उनकी शादी-शुदा ज़िन्दगी मुसीबत आ पड़ी, जब उन्होंने एक हरिजन परिवार को अपने घर से पीने के लिए पानी दे दिया। इस घटना का गाँव के लोगों ने बहुत विरोध किया और उन्हें गाँव से निकाल दिया। लेकिन हिम्मत से भरी मजबूत संपत ने अपने फैसले का खुद समर्थन किया और गांव छोड़ परिवार के साथ बांदा के कैरी गांव में बस गई।समाज में महिलाओं को साहस और जज्बे की मिसाल देने वाली संपत पाल आज देश की एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और उन्होंने उत्तर प्रदेश में महिला हिंसा के खिलाफ गुलाबी गैंग नामक संस्था की स्थापना की। संपत का सामाजिक सफर तब ही शुरू हो गया था, जब उन्होंने अपने पड़ोस में रहने वाले परिवार में पति को उसकी पत्नी को मारते-पीटते देखा और उसे मारपीट करने से रोकने के लिए गई। लेकिन उस शख्स ने संपत की नहीं सुनी और इस उनके घर का मामला बताकर इससे दूर रहने के लिए कह दिया।

महिला के साथ हो रही मारपीट को देखकर संपत के मन में कई सवाल उठे, की महिलायें कब तक अपने ही परिवार में इस हिंसा का शिकार होती रहेंगी और ये अत्याचार बिना कुछ कहे शती रहेंगी। क्यूँकि उस वक़्त महिलाओं को काफी दबाकर रखा जाता है। जिसके पीछे की एक वजह शिक्षा न होना भी था। इस घटना के बाद संपत ने उस महिला के पति को सबक सिखाने की ठान ली और कुछ महिलाओं को एकजुट कर उस शख्स की खेतों में ले जाकर काफी पिटाई की।

यहीं से शुरू हुआ उनका महिला सुरक्षा अभियान और उनकी ‘गुलाबी गैंग’  संपत ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा, जहां कहीं भी उन्होंने किसी तरह की ज़्यादती होते देखी तो वहां दल-बल के साथ पहुंच गईं और ग़रीबों, औरतों, पिछड़ों, पीड़ितों, बेरोज़गारों के लिए लडाई लड़नी शुरु कर दी। संपत का कहना है कि हमारी गैंग कोई आम गैंग नहीं है, ये महिलाओं के न्याय के लिए लड़ती है। गुलाबी गैंग की सदस्य गुलाबी साड़ी पहनती हैं।

गुलाबी गैंग शुरू में घरेलु हिंसा और महिला को घर से निकाल देने के खिलाफ दमनकारी पति, पिता और भाइयों को दंडित करता है। अधिक गंभीर अपराधियों को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा किया जाता है, जब वे उनकी बात सुनने से इंकार करते हैं। कभी-कभी गुलाबी गैंग की महिलाएं अपने लाठी का भी सहारा लेती हैं, अगर पुरुषों उनपर बल का इस्तेमाल करे।

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