Women Achiever’s Series: समाज को जेंडर इक्वलिटी को पाठ पढ़ाया, महिला सशक्तिकरण की मिसाल बनी सावित्रीबाई फुले

January 3, 2018 by No Comments

आज के वक़्त में जेंडर इक्वलिटी और नारीवाद जैसे मुद्दे सोशल मीडिया पर काफी चर्चा बनाये हुए हैं। लेकिन बात करें उस सदी की जब भारत में ब्रिटिश राज था तो महिलाओं की हालत आज के मुकाबले बहुत ही खराब थी। आजादी से पहले महिला अधिकारों की बात करना मानों किसी अपराध से कम नहीं था। फिर बात दलित समुदाय की महिलाओं की हो तो उनकी हालत और भी दयनीय थी।

सावित्रीबाई फूले, उस दौरान महिलाओं के लिए किसी मसीहा से कम नहीं थी। ये एक ऐसा नाम है, जिसे शिक्षा की देवी का दर्जा देना गलत नहीं होगा। सावित्रीबाई फूले ने महिलाओं की दशा को सुधारने में अपना सारा जीवन समर्पित किया है।
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को एक दलित परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम खन्दोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मी था। देश में बाल विवाह की संस्कृति के चलते सावित्रीबाई फुले की शादी 9 साल की उम्र में 1840 में ज्योतिबा फुले से कर दिया गया था। लड़कियों की उस वक़्त शिक्षा नहीं दी जाती थी।

इसलिए सावित्रीबाई फूले अनपढ़ थी। ज्योतिबा फुले, जोकि खुद एक महान विचारक, कार्यकर्ता, समाज सुधारक, लेखक, दार्शनिक, संपादक और क्रांतिकारी थे। उन्होंने सावित्रीबाई को शिक्षा के रास्ते पर अग्रसर किया और उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाया। सावित्रीबाई फूले ने इस सफर को ज्योतिबा फूले के साथ शुरू किया और खुद को सशक्त बनाया।
ज्योतिबा ने सावित्रीबाई के पति की भूमिका के साथ उनके संरक्षक, गुरु और समर्थक के रूप में उनका साथ दिया। दोनों ने साथ मिलकर महिला अधिकारों के लिए काम किए। सावित्रीबाई, जिनकों खुद अपने बचपन में शिक्षा से वंचित रहना पड़ा, उन्होंने साल 1848 ने भारत के पहले कन्या विद्यालय की स्थापना की और वहां पहली महिला शिक्षिका बनी।

सावित्रीबाई फूले को अगर मिसाल के तौर पर रखकर देश की हर महिला उनके कदमों पर चलना शुरू कर दे तो अपने अधिकारों को पाने के वह हर जंग जीत सकती है। सावित्रीबाई फूले ने अपनी जिंदगी समाज में महिलाओं को समानता के अधिकार दिलाने की लड़ाई लड़ी। उन्होंने देश में पहला अनाथ-आश्रम खोला, अनचाही गर्भावस्था की वजह से होने वाली शिशु हत्या को रोकने के लिए उन्होंने बालहत्या प्रतिबंधक गृह भी स्थापित किया।
सावित्रीबाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया जिसका उद्देश्य था देश से सती प्रथा जैसी कुरीति को हटा विधवा विवाह करवाना, ऊंच-नीच का फर्क खत्म करना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और महिलाओं को शिक्षित बनाना।

एक ही साल में ज्योतिबा फूले के साथ मिलकर उन्होंने पाँच नये विद्यालय खोले और अपने जीवनकाल में उन्होंने 18 महिला विद्यालय खोले।
जिसके लिए उन्होंने तत्कालीन सरकार द्वारा सम्मान भी मिला।
समाज से अज्ञानता मिटाने के इस सफर में सावित्रीबाई फूले को काफी मुशकिओं का सामना करना पड़ा। लेकिन वह अपने लक्ष्य के लिए अडिग थी। इसलिए उन्हें कोई में मुश्किल और अटकल रोकने में असमर्थ साबित हुई।

आज भी भ्रूण हत्या, महिला हिंसा, महिला शिक्षा पर रोक, महिला अधिकारों के शोषण के स्थिति को देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं की उस वक़्त में ऐसी मुद्दों पर काम करना मुश्किल नहीं असंभव सा लगता है। सावित्रीबाई को रोकने के लिए इस समाज में धर्म के ठेकेदारों ने बहुत हथकंडे अपनाये।

यहाँ तक लोग उन्हें परेशान करने के लिए उनपर पत्थर, कूड़ा-कर्कट, मल भी फेंक देते थे। जिसके चलते वह अपने बैग में हमेशा एक साड़ी रखती थी। सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ सावित्रीबाई एक कवियत्री भी थी। उन्होंने दो काव्य पुस्तकें लिखीं थी
‘काव्य फुले’ और ‘बावनकशी सुबोधरत्नाकर’
इसके साथ उन्होंने दलितों के जीवन सुधार और देश में जाति-व्यवस्था के भेदभाव मिटाने के हित में ‘सत्यशोधक समाज’ नामक संस्था बनाई, जिसका मकसद दलितों को उच्च जातियों के शोषण से मुक्त कराना था। दलित होते हुए सावित्रीबाई फुले ने अपने पति कसे साथ मिलकर काशीबाई नाम की एक गर्भवती विधवा महिला को आत्महत्या करने से बचाया और उसे अपने घर पर रखकर उसकी देखभाल की।

उनके द्वारा जन्म दिए गए पुत्र को गोद लिया। जिसका नाम यशवंत राव फुले रखा गया और ख़ूब पढ़ाया-लिखाया जो डॉक्टर बना।
प्लेग महामारी फ़ैल जाने पर सावित्रीबाई मरीजों की निष्काम सेवा करती थी। इस दौरान एक प्लेग के प्रभावित बच्चे की सेवा करते हुए वह खुद भी इसकी शिकार हो गई और इसी कारण से उनकी मृत्यु हुई।

सामाजिक कल्याण में उनके अमूल्य कार्य के लिए पुणे सिटी कॉर्पोरेशन ने साल 1983 में उनकी याद में एक स्मारक बनाया।
10 मार्च 1998 को उनके सम्मान में इंडिया पोस्ट ने एक डाक टिकट जारी किया था, वहीँ साल 2015 में, पुणे विश्वविद्यालय को उनके सम्मान में सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय का नाम दिया गया है।

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