Women Achiever’s Series: तुलसी मुंडा, आदिवासियों के लिए बनी शिक्षा का दूसरा नाम, पढ़े इनका सफर..

November 26, 2017 by No Comments

भारत में शिक्षा का स्तर अन्य देशों के मुकाबले काफी कम है। शिक्षा बच्चों के बेसिक जरूरत और उनका अधिकार हैं। अभी भी कई इलाके ऐसे हैं, जहाँ तक बच्चों को पढाई के बारे नहीं पता। बच्चों को उनका अधिकार नहीं मिल पा रहा है। उनके पास पढ़ने के लिए कोई सुविधाएं नहीं हैं। देश के रूरल इलाके आज भी शिक्षा के स्तर में काफी पिछड़े हुए हैं। लेकिन अगर लोग इस क्षेत्र में काम करने की ठान लें। तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। फिर चाहे आपके पास स्कूल और किताबों की सुविधा हो या ना हो। ऐसा ही एक नाम है तुलसी मुंडा का। तुलसी मुंडा एक ऐसी महिला हैं, जिन्होंने आदिवासी समुदाय के लोगों में शिक्षा का प्रसार किया। तुलसी मुंडा उड़ीसा के एक गाँव से आती है। वह पिछले काफी वक़्त से सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर काम कर रही है। आदिवासी समुदाय को साक्षर बनाने में उनका एक अहम योगदान रहा है। उन्होंने बाल श्रम से हटाकर बच्चों को शिक्षा देने का एक प्रयास शुरू किया था जिसके बलबूते आज कई बच्चे अपना भविष्य सुधार चुके हैं।

बात करें की उन्होंने इस कदम की शुरुआत कैसे की तो, मुंडा एक गरीब परिवार में जन्मी थी, आर्थिक तंगी के चलते उन्होंने 12 साल की उम्र में उड़ीसा की खानों में काम किया। इसके साथ मुंडा ने खुद को शिक्षित भी किया। इस दौरान मुंडा ने उन सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ काम किया। जो महिलाओं को शिक्षित करने पर काम कर रहे थे।

मुंडा ने विनोबा भावे को अपना गुरु बनाया। विनोबा भावे ने जब 1963 में उड़ीसा में भूदान आंदोलन पदयात्रा के दौरान उड़ीसा का दौरा किया, तो मुंडा ने उनसे मुलाकात की थी। जिसने मुंडा को उस रास्ते पर अग्रसर कर दिया जिससे उन्हें अपने लोगों की किस्मत को बदलना था। उन्होंने साल 1964 में सेरेन्डा में अपने पहले स्कूल की शुरुआत की। उन्होंने इस स्कूल को एक महुआ पेड़ के नीचे शुरू किया। जहाँ कच्ची जगह के ऊपर ही बच्चों को बिठाकर वह पढ़ाती थी।
इस दौरान पैसे न होने के कारण मुंडा को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लेकिन वह अपने लक्ष्य के प्रति इतनी समर्पित थी कि कोई भी परेशानी उन्हें रोक पाने में असमर्थ रही।
स्कूल के लिए पैसे इक्क्ठे करने के लिए मुंडा ने साथ काफी अन्य काम भी किये। स्कूल में बच्चों को पढ़ने भेजने के लिए उन्होंने गाँव वालो को समझाया और शिक्षा के प्रति प्रेरित किया।
गाँव वालो ने भी मुंडा के इस कदम में उनका पूरा साथ दिया। उन्होंने स्कूल बनाने के लिए पहाड़ तोड़ने और फिर स्कूल को बनाने में उनकी काफी मदद की। इस स्कूल को बनने में 6 महीने का वक़्त लगा। आज आदिवासी विकास समिति स्कूल 1,000 बच्चों को मंजूरी देता है और 200 रुपये की मासिक शुल्क के लिए 10 वीं कक्षा तक शिक्षा प्रदान करता है। इसमें तीन मंजिला इमारत, एक खेल का मैदान और लड़कों और लड़कियों के लिए एक छात्रावास भी है।

सेरेंडा गाँव के साथ, उसके लगते अन्य गांव में भी आज उनके स्कूल चल रहे हैं। मुंडा ने 10 से ज्यादा सुर स्कूलों को शुरू किया। आज इन स्कूलों में 2 हजार से ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं। मुंडा के मुताबिक, स्कूल चलाने के लिए उन्हें लंबे समय तक फंड की समस्या बनी रही। उनके पास शिक्षकों का भुगतान करने के लिए कोई पैसा नहीं था। जिसके चलते उन्होंने गांव के युवाओं को इकट्ठा किया जिन्होंने प्राथमिक स्तर तक पढ़ाई की हुई थी।

“वे सभी स्वेच्छा से आए थे। इसके साथ मेरे छात्रों ने फीस देने की पेशकश की तो चीजें हल होने लगी। इसके अलावा मेरे मेरे मिशन में कई बड़े औद्योगिक घरानों और कुछ विदेशी एजेंसियों ने चैरिटी दी। जिससे उन्हें आगे बढ़ने में काफी मदद मिली।
शिक्षा के क्षेत्र में कड़ी परिस्तिथियों के होने के बावजूद तुलसी मुंडा का काम अतुलनीय है।

इसके विशेष कदम को उठाने के लिए उन्हें साल 2001 में भारत सरकार द्वारा पदम श्री सम्मान से सम्मानित किया गया था। साल 2011 में तुलसी मुंडा ने सोशल सर्विसेस के लिए ओडिशा लिविंग लीजेंड पुरस्कार हासिल किया।

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