मोदी सरकार के महिला सशक्तिकरण की पोल खोलती रिपोर्ट

October 18, 2018 by No Comments

अगर आप एक ठीक ठाक सा स्मार्टफोन इस्तेमाल करना चाहते हैं तो आप के पास कम से कम दस हज़ार रुपये होने ही चाहिए।दस हज़ार से कम मे कोइ फ्रिज रेफ्रिजरेटर नहीं मिलेगा। एक अच्छा टीवी भी दस हज़ार रु आप से खर्च करवा ही लेगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश मे कितने लोगों की मासिक आय दस हज़ार से कम है।

इस समय देश मे 82 फीसदी पुरुषों को 10 हजार रुपये प्रति माह से कम की तनख्वाह मिलती है।महिलाओं को स्थिति तो और भी भयावह हैं ।92 फीसदी कामकाजी महिलाओं को प्रति माह 10 हजार रुपये से भी कम की तनख्वाह मिलती है। यह तब है जब देश मे महिला शक्तिकरण पर दिन रात चर्चा हो रही है। यह आंकड़े हैं “अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय” के सतत रोजगार केंद्र के श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) के।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर 67 फिसदी परिवारों की मासिक आमदनी 10 हजार रुपये थी, जबकि 7वें केंद्रीय वेतन आयोग द्वारा अनुशंसित न्यूनतम वेतन 18 हजार रुपये प्रति माह है। यानी एक बड़े वर्ग को उचित मज़दूरी नहीं मिल रही है।रिपोर्ट के मुताबिक 90 फीसदी उद्योग मजदूरों को न्यूनतम वेतन से नीचे मजदूरी का भुगतान करते हैं। वहीं अगर हम उत्पादन की बात करें तो पिछले तीन दशकों में संगठित क्षेत्र की उत्पादक कंपनियों में श्रमिकों की उत्पादकता 6 फीसदी तक बढ़ी है, जबकि उनके वेतन में मात्र 1.5 प्रतीशत की बढ़ोतरी हुई है।

बेरोजगारी के बारे मे यह रिपोर्ट कहती है कि 2015-16 मे भारत की बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी जबकि 2013-14 में यह 4.9 फीसदी थी। बेरोजगारी दर शहरी क्षेत्रों 4.9 प्रतीशत जबकि ग्रामीण क्षेत्रों 5.1 प्रतीशत है। उम्मीद के मुताबिक पुरुषों की तुलना में महिलाओं के बीच बेरोजगारी दर अधिक है। राष्ट्रीय स्तर पर कामकाजी महिलाऔं मे बेरोजगारी दर जहां 8.7 फीसदी है वहीं पुरुषों के बीच यह दर 4 फीसदी है। कामकाजी लोगों में से अधिकांश ख़ुद के रोजगार में लगे हुए हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर 46.6 फीसदी श्रमिकों स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं, इसके बाद 32.8 फीसदी सामयिक मजदूर हैं। रीपोर्ट मे कहा गया है कि , भारत में केवल 17 प्रतिशत व्यक्ति वेतन पर कार्य करते हैं और शेष 3.7 प्रतिशत संविदा कर्मी हैं।

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