पितृसत्ता के खिलाफ जन्म से पहले ही शुरू हो जाता है महिला का संघर्ष..

January 2, 2018 by No Comments

                                                               पितृसत्ता और महिलाओं का संघर्ष भाग-1

महिला होना, जीवन भर के लिए एक संघर्ष है। पितृसत्ता से जूझ रही मानसिकता वाले देश में ये संघर्ष बहुत ही अहम बात होते हुए भी मामूली सी बन जाती है।
ये संघर्ष महिला के जन्म से पहले ही शुरू हो जाता है। माँ की कोख में पल रही संतान अगर लड़की हो तो उसको पैदा होने के लिए एक लम्बे संघर्ष से निकलना होता है, वहीँ बाहरी समाज, जिसमें उसका अपना परिवार एक मुख्य इकाई की तरह काम करता है, उसे उस बच्ची को जन्म देने के लिए लड़ना पड़ता है।
पुरुष प्रधान समाज में महिला के अधिकारों की बात करना एक छुआछूत की बीमारी बना दी गई है। जिसके बारे में बात करने पर बीमारी और बढ़ सकती है। एक महिला को एक महिला को ही जन्म देने से रोका जाता है। उसे इतना मजबूर कर दिया जाता है कि एक लड़की को जन्म देने की सोच उसके लिए जानलेवा बन जाती है।
लेकिन क्या इसके लिए सिर्फ पितृसत्ता को दोष देना सही है ?

पितृसत्ता को परिभाषित किया जाए तो हम कह सकते हैं कि पावर जिसके हाथ में होगी, वही राज कर सकता है।  एक परिवार में पितृसत्ता को समझने के लिए हम उदारहण लेते हैं परिवार में 4 चार बेटे हैं। चार बेटों की पत्नियां, एक सास और ससुर।
घर में पुरुष और महिलाओं की संख्या बराबर है, लेकिन परिवार में राज करते हैं पुरुष। उन्ही की सुनी- कही जाती है। महिलाओं को दबाया जाता है। लेकिन यहाँ पर अगर महिलायें एक होकर अपनी आवाज़ उठाना चाहे तो उठा सकती हैं।
बात है महिलाओं को परिवारों में दी जा रही आंतरिक शिक्षा की। यूं तो आज हम अपने देश को मॉडर्न इंडिया का नाम देते हैं। लेकिन आज भी इस देश का बड़ा तबका ऐसा है महिलाओं को परिवारों में पुरुषों की हां-में हां मिलाना, उनके सामने मुंह न खोलना और जो मिले उसमें खुश रहने जैसे बातें सीखा कर उनकी मानसिक स्थिति को कमजोर करने की जड़ रख दी जाती है।
ये वो बेसिक अधिकार हैं, जो हमारे संविधान में पुरुषों और महिलाओं के लिए बराबर बनाये गए हैं। जैसे की फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन, और फ्रीडम ऑफ़ स्पीच।
यहाँ पर किसी महिला की पढ़ा-लिखा और अनपढ़ होना मायने नहीं रखता। यहाँ मायने रखता है कि अगर आप महिला हैं तो आपको सहनशील होना है। सहनशीलता की दलील देकर हमें अपने अधिकार को खोने और उसके लिए आवाज़ उठाने का इशारा दिया जाता है।
दरअसल ये बहुत ही छोटी बातें हैं, जो बहुत बड़े पैमाने पर एक महिला के जीवन को प्रभावित करती हैं। जैसे कि लड़की को घर में शुरूआती शिक्षा में ही लड़कों से अलग कर दिया जाता है।

आवाज़ न उठाना आगे चलकर महिला के जीवन को किस तरह से प्रभावित करता है:

शिक्षा नहीं देना,
लड़कियां घर से बाहर नहीं जाती
पूरे शरीर को ढक कर रखती हैं, कहीं तो घूंघट भी
घर के सभी काम लड़कियों द्वारा किया जाना एक कथित फंडामेंटल लॉ करार दिया गया है
घर के पुरुषों के सामने मुंह न खोलना, उनकी बराबरी का तो सोचना भी नहीं
किसी भी तरह की नौकरी या व्यापर पर मनाही
प्रेम संबंध पर रोक
अपनी मन मुताबिक शादी तो बहुत दूर की बात

दरअसल महिलायें खुद पर लगाई जाने की पाबंदियों पर खुद सहमति जताती हैं, सिर्फ इसकी शुरुआत में एक आवाज़ न उठा कर।

प्रियंका शर्मा

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