जब समय अच्छा ना हो तो सोचिए कि हर ख़ुशी, हर उम्मीद, हर आस, हर जवाब हमारे अपने अंदर है

September 6, 2018 by No Comments

उलझी डोर का छोर:
आज मन सुबह से ही ख़राब-सा है..वो होता है न कि बेवजह बस मन न लगे कहीं..न किसी से बात करना अच्छा लगे न किसी का बात करना..न किसी को कुछ कहने का मन हो न सुनने का..काम ढेर सारा याद आए पर समझ न आए कि करना क्या है? बस कुछ इसी तरह का मन है आज।

वैसे इस ब्लॉग पर ये मेरी पहली पोस्ट है और कुछ भी जो पहला हो, वो तो ख़ास होता है न..उसे हम बहुत अच्छे से शुरू करना चाहते हैं..ढेर सारी अच्छी-अच्छी बातों के साथ। तो मैं क्यों नकारात्मक विचारों से शुरू कर रही हूँ? ये शायद आप सोच रहे हों पर मुझे भी पहले ऐसा ही लगा। लेकिन पता है फिर मुझे लगा कि विचार तो सिर्फ़ विचार होते हैं हम उनसे किस तरह डील करते हैं ये तरीक़ा उसे नकारात्मक या सकारात्मक बनाता है। अगर हम परेशान हों तो उसे छुपाकर ख़ुद को ख़ुश दिखाना तो उस परेशानी को बताने से ज़्यादा नेगेटिव है। उसकी बजाय अगर हम अपनी परेशानी बाँट रहे हैं तो ये एक अच्छी शुरुआत हुई। इसका मतलब है कि हम उस परेशानी को दूर करना चाहते हैं..है न?..मुझे तो ये इसी तरह लगता है।

देखा जाए तो इन छोटी-छोटी दिमाग़ी उलझनों को बचा-बचा कर हम ख़ुद को ज़्यादा उलझा लेते हैं और बाद में तो कुछ समझ ही नहीं आता। बड़े तौर पर कहें तो यही उलझनें मिलकर डिप्रेशन का रूप धर लेती हैं और उसे समझने से ज़्यादा तो स्वीकारने में वक़्त लगता है। किसी भी तरह की परेशानी को एक सुलझे हुए इंसान से बाँटना या ख़ुद ही लिख देना एक सही क़दम हो सकता है। पर हम करते ये हैं कि अपनी छोटी-छोटी परेशानियों को संभालकर बड़ा होने तक बचाते हैं और बाद में एकदम से फटते हैं या फिर शरीर को बीमारियों में डालते हैं।

वैसे देखा जाए तो हमारे आसपास ही कई लोग मिल जाएँगे जो डिप्रेशन में हों पर वो हमें दिखते नहीं क्योंकि हम उनके पहने मुखौटे को देखते हैं, जिसमें मुस्कान दिखती है, ख़ुशी दिखती है या हर सुख-सुविधा दिखती है। अब ऐसा कोई ज़रूरी तो नहीं कि एक इंसान, जिसकी ज़िंदगी में सबकुछ ठीक दिख रहा हो, सारे-रिश्ते नाते पर्फ़ेक्ट हों, वो ख़ुश भी हो। आजकल तो इस विषय में भी जागरूकता बढ़ रही है। कुछ लोग इसे पहचान जाते हैं और ख़ुद ही इलाज करवाने भी जाते हैं पर क्या इसका फ़ायदा होता है?..मुझे लगता है किसी भी इलाज का तब तक फ़ायदा नहीं होता जब तक आप ख़ुद नहीं चाहते।

मैंने पिछले दिनों कुछ वीडियोज़ देखे थे, जिसमें कुछ लड़कियाँ अपने डिप्रेशन के बारे में बता रही थीं। उनकी ज़िंदगी तो काफ़ी मुश्किलों से घिरी हुई रहीं थीं, पर उन्होंने इतनी कठिन ज़िंदगी जीते हुए भी ख़ुद के लिए कुछ किया। उनमें से एक लड़की की बात मुझे याद है वो कह रही थीं कि अब भी वो पूरी तरह डिप्रेशन से बाहर है, ऐसा नहीं कह सकती। उसे अक्सर डिप्रेशन के अटैक आते हैं और वो उस स्थिति में भी जाती है, जहाँ उसे कुछ समझ नहीं आता लेकिन अब वो जानती है कि ऐसी फ़ीलिंग से उसे कैसे डील करना है। इन विडियोज़ में एक ख़ास बात मैंने देखी वो ये कि इन लड़कियों ने कहा कि एक दिन ऐसा आया जब इन्होंने ये निर्णय लिया कि “अब बस उन्हें इस अवस्था में( डिप्रेशन में) नहीं रहना है, जितनी ज़िंदगी है उसे जीना है”…और इसके बाद उनकी ज़िंदगी में बदलाव भी आए। मुझे यही बात सबसे ज़्यादा ख़ास लगी और इस पर ध्यान देना सबसे ज़रूरी है।

डिप्रेशन हो, दुःख हो, हार हो, कुछ भी हो..जब तक आप ख़ुद ये नहीं ठान लेते कि आपको इस स्थिति में और नहीं रहना है, तब तक आप उससे बाहर नहीं निकल सकते। वो कहते हैं न कि जो ख़ुद की मदद नहीं करता उसकी मदद कोई नहीं कर सकता। तो जब हम ख़ुद किसी परिस्थिति से बाहर नहीं आना चाहेंगें कोई हमारी कितनी मदद कर पाएगा? हाँ..डॉक्टर या काउंसलर कुछ। मदद कर सकते हैं पर एक हद तक ही।

वैसे इतने आत्मविश्वास से ये बात कहने के पीछे मेरा भी एक अनुभव है। एक वक़्त था जब मैंने ख़ुद ये सब महसूस किया, एक ऐसा समय जब कोई भी ख़ुशी, कोई भी अच्छी चीज़, कोई भी अच्छी बात, कुछ भी मुझे ख़ुशी महसूस नहीं करवा पाते थे। ऐसे वक़्त में एक दिन जाने क्या मेरे मन में आया और मैंने अपनी डायरी, जो सालों से बिना लिखे रखी हुई थी, उठायी और उसमें लिखा कि अब बहुत हो गया है मुझे किसी भी तरह ख़ुद को, दस दिन या शायद सात दिन में, ख़ुशी तोहफ़े में देनी है। उतना वक़्त इसलिए निर्धारित किया क्योंकि मेरा जन्मदिन आने वाला था। ये बात लिखने से पहले मैंने अपने मन के सारे भावों को भी उस डायरी में जगह दी थी और लिखते-लिखते ही ये ख़याल मुझे आया था कि मैंने ख़ुद को कितनी तकलीफ़ पहुँचायी है और आख़िर में बस ख़ुद को जन्मदिन पर ख़ुशी गिफ़्ट करने की बात लिख दी।

ये एक ऐसा गिफ़्ट था जो मुझे अपने जन्मदिन पर ख़ुद से चाहिए ही था। ये ख़ुद से एक वादे की तरह था और मुझे इसे किसी भी हाल में पूरा करना था..बस रोज़ डायरी में अपने ख़ुश होने के जो थोड़े वक़्त होते थे वो नोट करने लगी थी और ख़ुद का ख़याल रखने लगी थी। ये तो नहीं कह सकती कि उन्हीं दस या सात दिनों में मैं पूरी तरह ख़ुशी महसूस करने लगी थी, क्योंकि ऐसा हुआ नहीं था लेकिन एक शुरुआत हो चुकी थी और फिर उसे आगे ही बढ़ने दिया। ऐसा नहीं है कि अब उस तरह का लो-फ़ेज़ नहीं आता…आता है, जैसे आज आया, पर वो इतना असर नहीं कर पाता क्योंकि कहीं न कहीं उससे कैसे सामना करना है ये तरीक़ा आ गया है।

जैसे मेरे लिए लिखना, पौधे लगाना, कभी-कभी पढ़ना भी एक थेरेपी की तरह काम करता है वैसे ही आपके लिए कुछ और चीज़ें होंगी जो काम करेंगी..उन्हें ढूँढिए। आपके ऐसे शौक़ या काम जिससे आपको ख़ुशी मिले। पता नहीं ये कहना सही है या नहीं, पर दूसरे इंसानों में अपनी ख़ुशी तलाशना बेमानी है, वो व्यस्त हो जाएँगे और आप अकेले..। इससे बेहतर है अपनी ख़ुशी..अपना सुकून..अपने शौक़ में तलाशिए…ख़ुद में तलाशिए। इसका मतलब ये भी नहीं है कि आप इंसानों से दूर भागें..इंसानों से भी मिलिए लेकिन उनसे मिलकर आपकी ख़ुशी बढ़नी चाहिए और आपका शौक़ बरक़रार रहना चाहिए।

हर ख़ुशी, हर उम्मीद, हर आस, हर जवाब हमारे अपने अंदर है..ज़रूरत है तलाशने की। ज़िंदगी में कई लोग आएँगे, हमसे मिलेंगे…हमारे जीवन में अपनी छाप भी छोड़ जाएँगे, लेकिन हमारे सच्चे साथी हम ख़ुद ही हैं। जब हम ख़ुद में ख़ुशी ढूँढ पाएँगे और ख़ुश रह पाएँगे तभी आसपास भी ख़ुशियाँ बाँटना आसान होगा। आज के लिए इतना ही अगले किसी विचार के साथ फिर मिलेंगे.

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लेखिका- नेहा शर्मा

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