गुजरात दंगो पर ‘शाह’ ने किया बड़ा खुलासा,पीएम मोदी पर बड़ा प्रहार

October 11, 2018 by No Comments

आर्मी स्टाफ के डिप्टी चीफ से रिटायर होने वाले जमीरुद्दीन शाह ने इसका खुलासा अपनी आने वाली किताब “दि सरकारी मुसलमान” में किया है जिसका 13 अक्तबूर को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में पूर्व राष्ट्रपति हामिद अंसारी विमोचन करेंगे।

अपने संस्मरण में शाह लिखते हैं कि गुजरात सरकार ने 28 फरवरी 2002 को केंद्रीय गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के जरिये सेना की तैनाती का निवेदन किया था, लेकिन तब के आर्मी चीफ जनरल एस पद्मनाभन को उदृत करते हुए वो कहते हैं कि “जूम आज रात को अपने फार्मेशन को गजुरात के लिए तैयार करो और दंगे को कुचल दो” मैंने जवाब दिया “सर सड़क के रास्ते से दो दिन लगेगा”

उन्होंने मुड़कर जवाब दिया, जोधपुर से तुम लोगों के जाने की एयरफोर्स जिम्मेदारी लेगी। ज्यादा से ज्यादा सेना को एयरफील्ड में ले जाओ। तेजी से और पूरी ताकत के साथ कार्रवाई समय की जरूरत है।’”

लेकिन 3000 सेना के जवान जो 1 मार्च को सुबह 7 बजे ही अहमदाबाद की एयरफील्ड में उतर चुके थे उन्हें गुजरात प्रशासन द्वारा यातायात मुहैया कराए जाने के अभाव में पूरा एक दिन इंतजार करना पड़ा लेकिन कुछ भी नहीं कर सके, इसी दौरान सैकड़ों लोग मारे जा चुके थे।

2002 गुजरात दंगा मामले में लेफ्टिनेंट जनरल जमीरुद्दीन शाह ने कुछ सनसनीखेज खुलासे किए हैं जिसमे उन्होंने बताया कि 28 फरवरी और 1 मार्च 2002 के बीच की रात के 2 बजे अहमदाबाद में तब के रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडीस के साथ उनकी उस समय के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात हुई थी।

शाह लिखते हैं कि “अहमदाबाद के अंधेरे और बिल्कुल वीरान एयरफील्ड में पहुंचने के बाद उन्हें जरूरत थी “दूसरे साजो सामान और गाड़ियां कहां हैं जिनका वादा किया गया था, उन्हें पता चला कि राज्य सरकार अभी भी जरूरी व्यवस्था करने में लगी है जो अभी लोगों के बीच नहीं पहुंच पाई है।

शाह से जब ये सवाल पूछा गया कि अगर उस वक़्त सेना को पूरी स्वतंत्रता दी गयी होती और उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर जो मांगा था उसे मुहैया कराया गया होता तो क्या नुकसान कम हो जाता ? इस पर शाह सहमति जताते हुए कहते हैं कि “बिल्कुल निश्चित तौर पर नुकसान बहुत-बहुत ही कम हुआ होता अगर हमें रात में ही गाड़ी मुहैया करा दी जाती जो पुलिस छह दिनों में नहीं कर सकी उसे हम लोगों ने 48 घंटे में कर दिखाया होता हालांकि जबकि संख्या में हम उनके छह गुना कम थे।

हम लोगों ने 4 मार्च को 48 घंटे में पूरा आपरेशन खत्म कर दिया लेकिन इसे 2 मार्च को ही खत्म किया जा सकता था। अगर हम उस महत्वपूर्ण समय को नष्ट नहीं किए होते तो बहुत बड़ा हादसा और देश को नुकसान पहुंचाने से बचाया जा सकता है।

आगे बढ़ते हुए उन्होंने कहा कि वो किसी खास पर आरोप नहीं लगा रहे हैं लेकिन ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था करने में कुछ समय लग सकता है लेकिन इस तरह की एक ऐसी स्थिति में इसे संभवत: बहुत तेजी से किया जा सकता था लेकिन इसमें जल्दबाजी नहीं की गई।

शाह ने बताया कि जब भीड़ सड़कों पर घरों में आग लगा रही थी तब पुलिस मौन होकर किनारे खड़ी थी तमाशा देख रही थी।सेना के बुजुर्ग अफसर ने कहा कि “मैंने बहुमत समुदाय के ढेर सारे विधायकों को पुलिस स्टेशनों में बैठे देखा, उनका वहां रहने का कोई मतलब नहीं था। जब भी हम पुलिस को कर्फ्यू लगाने के लिए कहते उसे वो कभी भी अल्पसंख्यक इलाके में नहीं लागू करते।

अंत में जब उनसे दंगे में राजनीतिक हाथ के बारे में पूछा गया तो शाह ने कहा कि वो पुराने घाव को खोलना नहीं चाहते हैं। मैंने पुलिस के बारे में जो सच है उसी को कहा है और मैंने जो लिखा है उसके एक-एक शब्द पर कायम हूं उन्होंने कहा कि “भूलने के लिए तीन पीढ़ियां गुजर जायेंगी” मैं फिर से घावों को खोलना नहीं चाहता हूं।

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